Saturday, December 22, 2018

विकास और विनाश

शहर से लेकर हाईवे की सड़कें मंत्रमुग्ध करने लगी है। कारें और गतिमान वाहन बड़ी शान से दौड़ने लगे हैं। बड़े लोग भी बड़ी शान से तेज गाड़ी का लुत्फ उठाते हैं। और इसे विकास का एक बड़ा पहलू मानते हैं। सचमुच तमाम दलीलें साबित भी करती है कि विकास दिख रहा है। विकास की सबकी अपनी परिभाषा है। सबकी सोच है, पर मेरा मन निगोड़ा आज भी इन सड़क निर्माण के नीचे कुर्बान हुए तमाम जीवनदायी वृक्षों के लिए जार जार रो रहा है। करीब पच्चीस किलोमीटर की मेरी दैनिक यात्रा की राह में तीन चार सौ पीपल, नीम, आम, महुआ, कैथा, जामुन और अमरूद जैसे वृक्षों के काटने का काम किया गया। कारण इन वृक्षों का अपराध चौड़ी होती सड़क के बगल में खड़ा होना। तमाम दया और कानून ने जिन पेड़ों का संरक्षण अभी तक किया। उन्हें उनकी उम्र और सेवाओं को देखे बिना विकास रूपी राक्षस ने बेरहमी से काटा। उनका खून बहता रहा पर किसी को दया नहीं आई। कानून ने भी विकास का खूब साथ निभाया।
आने वाली पीढ़ी इस विकास के साथ कैसे जियेगी? जब उसे सांस लेने के लिए ऑक्सीजन न मिलेगी। कथन याद आता है "एक वृक्ष दस पुत्र समान"। यह सरकारी नारा था। सभी वृक्षों की हत्या करके विकास बलबलाया है। सब कुछ बहुत सुंदर लग रहा है। परंतु कब तक? पानी तो पीने के लिए दुर्लभ हो रहा है हवा भी प्रदूषित। अब शायद पर्यावरण दिवस पर मसाला काफी हो जायगा। जे सी बसु साहब ने बताया था पेड़ पौधों में जीवन होता है। और जीवन हत्या के लिए आईपीसी की धारा में 302 का केस चलता है। पर शायद ऐसे बड़े कामों में शहादत की जरूरत होती ही है। यही तो है विकास बनाम विनाश।
पंडित राकेश मालवीय