भाषा का कोई द्वन्द्व नहीं है यह तो बहता नीर।
संप्रेषण की कुशल तरंगिणी, फिर क्यों मन में पीर।।
हिन्दी से अपराध ये कैसा, देवनागरी भाषा।
बने राष्ट्र की मौलिक भाषा, यह मन की अभिलाषा।।
राजनीति की काली चूनर, भाषा के क्यों ऊपर।
अंग्रेजी का छद्म उपद्रव, बीते वर्ष बहत्तर।।
कई बार की मीटिंग में भी, बनी न राष्ट्र की वाणी।
हिन्दी तो जन जन की भाषा, और देश की रानी।।
राष्ट्र का ध्वज है, राष्ट्र की गरिमा राष्ट्र की आन बान।
हिन्दी तो वाणी की वाणी, हिन्दी देश की शान।।
राकेश इसको नमन हैं करते, हिन्दी के उन्नायक।
हिन्दी से ही ताकत अपनी, हिन्दी में जननायक।।
आज नहीं तो कुछ वर्षों में, हिन्दी धनी मनी होगी।
देवनागरी लिपि है जिसकी, राष्ट्रभाषा बनी वही होगी।।
राकेश की अच्छी उम्मीदे, लम्बी रेस लगाएँ।
हिन्दी प्रेमी को नमस्कार है, सब मिल साथ में गाएँ।।
हिन्दी में वर्णों की संख्या, पूरी बावन होती।
छब्बिस वर्णो की संख्या लेकर, अंग्रेजी हमको ढोती।।
हिन्दुस्तान सिरमौर जगत का, हिन्दी है पहचान।
देवतुल्य भावों में भरकर, देती ज्ञान महान।।
राकेश नमन हृदय से करते, ईश का कर सम्मान।
संस्कृत है जिसकी जननी, भाषा वही मान यशगान।।
पंडित राकेश मालवीय मुस्कान
Saturday, September 14, 2019
हिन्दी पर रार क्यों?
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