अनुकरण और संस्कृति
किसी भी संस्कृति का निर्माण उस देश की जाति और धर्म के द्वारा होती है। संस्कृति के मूल उपादान तो प्रायः सभी सुसंस्कृत और सभ्य देशों में एक सीमा तक एक समान ही रहते हैं। किंतु बाह्य उपादानों में यह अंतर अवश्य देखा जाता है, राष्ट्रीय या जातीय संस्कृति का सबसे बड़ा योगदान यही है कि वह हमें अपने राष्ट्र की परंपरा से जोड़ती है। अपनी रीति-नीति और संपदा से कभी भी अलग नहीं होने देती। भारतीय संस्कृति इस प्रकार की एक सनातन धर्म संस्कृति है जिसका पार पाना विश्व के किसी भी कोने में सहज नहीं है।
आज के युग में राष्ट्रीय एवं जातीय संस्कृतियों के लिए आपसी मिलन के अवसर अत्यंत सुलभ हो गए हैं। इस तरह से संस्कृतियों का आपस में एक अदृश्य संघर्ष भी शुरू हो गया है। कुछ ऐसे विदेशी प्रभाव हमारे देश और समाज में पड़ रहे हैं, जिनके आतंक ने हमें अपनी संस्कृति के प्रति भयावह रूप से शंकालु बना दिया है। कभी-कभी तो यह देखने को मिलता है कि हमारी आस्था ही अपनी संस्कृति के प्रति डिगने लगी है। यह हमारी वैचारिक दुर्बलता का प्रति परिणाम है। जब हम अपनी संस्कृति के महत्व को बिना जाने किसी अन्य राष्ट्र की संस्कृति के प्रभाव में आ जाने के कारण या विदेशी संस्कृति के विवेक हीन अनुकरण द्वारा अपने राष्ट्रीय गौरव को ठेस पहुंचाने लगते हैं। यह भ्रम हो जाता है कि हम बड़े विवेकवान हैं।
हालांकि देखा जाए तो भारतीय संस्कृति में त्याग और ग्रहण की अद्भुत क्षमता है। सर्वस्व त्याग देने वाले श्रीराम यहीं हैं, अपनी क्षमता के बल पर उसे ग्रहण कर लेना भी हमें भारतीय संस्कृति में देखने को मिलता है। आज जब भारतीय संस्कृति वैज्ञानिक युग में अपनी जीवंतता को चरितार्थ कर चुकी है। बहुत से लोगों द्वारा विदेशी संस्कृतियों के आडंबर से इस पर कुठाराघात होता रहता है। कई लोग इसके शिकार भी हो जाते हैं। बहुधा जो अधकचरे होते हैं वह अपनी संस्कृति का प्रतिकार करके स्वाभिमान महसूस करते हैं। यह किसी भी राष्ट्र के गौरव की बात नहीं हो सकती। एक राष्ट्रवादी व्यक्तित्व पहले पूर्णतया अपनी संस्कृति देश काल परिस्थिति का खुली आंखों से अवलोकन करता है तदुपरांत ही वह किसी अन्य अच्छी चीज को ग्रहण करता है।
यह सच है कि आज के वैज्ञानिक युग में हम किसी भी विदेशी संस्कृति के जीवंत तत्वों को ग्रहण करने में पीछे तो नहीं रहना चाहेंगे, किंतु अपनी सांस्कृतिक निधि की उपेक्षा करके या उसको दांव पर लगाकर तो कतई नहीं। यह परनिर्भरता एक राष्ट्र की गरिमा के अनुरूप नहीं होती। हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि कोई भी पौधा सूर्य की रोशनी के अलावा अपनी जमीन और जड़ों के बिना जीवित नहीं रह सकता। यद्यपि उसे जीवन शक्ति सूर्य की किरणों से मिलती है। इसी तरह से हम परसंस्कृति पर निर्भर होकर अविवेकी अनुकरण और अज्ञानता का ही परिचय दे रहे होते हैं।
सांस्कृतिक कुठाराघात का कुटिल चरित्र हमने ब्रिटिश कंपनियों से भी देखा। उन्होंने जिस प्रकार से अपनी भाषा द्वारा हमें आज तक गिरवी बनाए रखा। हमारे लिए पंगु बन जाने के करीब है। जब भारतीय संस्कृति अपनी देववाणी भाषा द्वारा लोगों को प्रबुद्ध व पूर्ण बनाए रखती थी, अंग्रेजों से देखा नहीं गया। उन्होंने इतने प्रतिभाशाली लोगों को कैसे वश में किया जाए यह उपाय अपनी भाषा द्वारा हमारी संस्कृति पर कुठाराघात करके किया। आज देश की आजादी के 75 साल होने को है लेकिन हम उस पर जन्मे भाषा और संस्कृति से उबर नहीं पाए। हम सोच भी नहीं पाते की हमें अपनी देवनागरी भाषा संस्कृत के द्वारा पाठ पारायण करना चाहिए। अपने बच्चों, अपनी आने वाली नस्लों को सुसंस्कृत बनाना चाहिए। अंग्रेजी ना आना हीनता महसूस करा देती है परंतु हिंदी लाना गौरव की बात महसूस होती है यह मौलिक संस्कार या अपनी संस्कृति से उपस्थित होने के कारण है। विदेशी ताकतें अपना पूरा जोर लगाए रहती हैं। हम गर्व महसूस करते हैं की हम पाश्चात्य संस्कृति से पुष्ट हैं। यह अज्ञानता नहीं तो और क्या है? एक बार हम सहृदय होकर सोचे, आत्मसम्मान को जगाए, आत्म-संस्कृति से परिचित हो। तो संभवतः हम और हमारा राष्ट्र प्रेम अपनी पूर्णता को प्राप्त कर सकता है। किसी देश की संस्कृति ही उसे गौरवशाली बनाती है परजीवी होने से बेहतर है आत्मनिर्भर होना। आत्मनिर्भर व्यक्ति, समाज और राष्ट्र सदैव आदरणीय होता है। आइए अपनी संस्कृति पर गर्व करें और उसका विस्तार करें।
पंडित राकेश मालवीय मुस्कान