Saturday, May 25, 2019

शिक्षा सुधार

शिक्षा में बहुत सारी खामियां हैं। इन्हें हम कुछ परिवर्तन के साथ पूर्णतया सुधार सकते हैं। जैसे बच्चों में पढ़ने की प्रवृत्ति, बच्चों को पढ़ने के लिए कुछ पुरस्कार वगैरह भी जरूरी हो जाते हैं। विषय रोचक होने चाहिए। अध्यापक नीरस व निराश नहीं होना चाहिए। शुरू से ही रोचक विषयों को काव्यात्मक ढंग से  पढ़ाने से  बच्चे  आजीवन याद रखते हैं। अध्यापन कार्य कहानी, चित्र कथा,  वीडियो की व्याख्या करते हुए भी बताया जा सकता है। अध्यापन का मूल मंत्र बच्चों में एकाग्रता पैदा करना अनिवार्य होता है। यह अध्यापक विशेष की व्यक्तिगत प्रवृत्ति हो सकती है। बच्चे पूर्ण रूप से शिक्षित और सुसंस्कार बने इसके लिए प्रारंभिक कक्षाओं से संस्कृत का अनिवार्य होना आवश्यक है। बच्चों को नीतिपरक दोहे,  श्लोक तथा सुभाषितानि याद कराना चाहिए और आचरण में लाने के लिए वातावरण प्रदान करना चाहिए। यदि हम बच्चे से अपेक्षा करते हैं कि वह झूठ ना बोले तो हमें झूठ ना बोल कर एक मिसाल पैदा करनी चाहिए; क्योंकि यदि हम कहें कि सदा सत्य बोलो और स्वयं झूठ के सहारे चलें तो प्रभाव कारी नहीं हो सकती। अतः शिक्षक स्वयं आचरणवान तथा संस्कार से पूर्ण होना चाहिए। शिक्षा समितियों को अध्यापन के लिए अध्यापक चुनाव में इन बातों का गंभीरता से ध्यान रखना चाहिए। सामाजिक तौर पर हम अर्थ प्रवृति के कारण संस्कारों को भूलते जा रहे  हैं जो सामाजिक विघटन का महत्वपूर्ण कारण है। मेरे अनुसार भारत देश में संस्कृत भाषा तथा हमारे पूर्वज नामक पुस्तक को जरूर चलाना चाहिए। शिक्षा पद्धति संपूर्ण देश में एक समान होनी चाहिए। उसमें नैतिक शिक्षा पर प्रचुर मात्रा में बल देना चाहिए। यदि बच्चे में स्वयं सीखने की आदत डाल दी जाए तो हमारा प्रयास सफल और आसान हो जाएगा। इसके लिए सामाजिक जागरूकता की आवश्यकता है। साफ-सफाई, पर्यावरण,  रहन-सहन सब में आमूलचूल परिवर्तन जरूरी है। लोगों को अपने कर्म के प्रति सजगता और सावधानी व जागरूकता आवश्यक है। तभी हमारा मिशन शिक्षा में नई पद्धति के अनुसार देश को शिक्षित बनाना पूर्ण हो पाएगा।
धन्यवाद