आज का राजनीति का स्तर समझ से परे है। कुर्सी की कुत्सित इच्छा समाज को क्यों अधःपतन की ओर घसीट रही है । नेता हमारे समाज से ही जाते हैं तो हम वोटरों का कर्त्तव्य बन जाता है कि हम किसे चुनकर संसद में भेजे। परंतु यहाँ सबका अपना नजरिया है किसी को एक खाने में नहीं रखा जा सकता। सत्तर वर्ष से हम वोटर सिर्फ प्रयोगवाद पर ही लगे हैं। एक चीज जरूर उभर कर आई है छत्तीसगढ़ में जोगी का शपथपत्र में घोषणापत्र। ऐसे ही कानूनी घोषणा पत्र सब लिखकर दें। दस्तखत भी करें।
हाँ राजनीतिक दौर में एक दूसरे के प्रति घृणा का खुलकर गालियों में तब्दील हो जाना चिंता का विषय है। चुनाव मुद्दों पर लड़े जाय। आरोप प्रत्यारोप के झूठे प्रहारों के लिए कानून हो जो सख्ती से लागू हो तथा इसका त्वरित न्याय और सजा हो। लोगों को गुमराह करके सत्ता हथियाने वालों को सजा मिलनी चाहिए। जिस तरह से नेता एक दूसरे के प्रति अपशब्दों का प्रयोग कर रहे हैं वह दिन दूर नहीं जब लोग पटकी पटका पर उतर आए।यह विषय गंभीर और चिंतनीय है। हम सबको इस पर जरूर विचार करना चाहिए। किसी पार्टी और समाज में न बँधकर बल्कि सम्पूर्ण नेता जाति पर सोचना होगा। विचारवान नेता स्वयं आगे आएं और इस महत्वपूर्ण विषय पर एक नियम नीति बनाएँ। यदि सुधार न हुआ तो सामाजिक पर्यावरण बिगड़ जाएगा।
लोग समझदार हैं पर सत्ता लोलुपता कहाँ न पहुँचा दे। इसीलिए यह भी आवश्यक है कि रोज रोज चुनाव न हो। चुनाव लड़ने वालों की योग्यता निर्धारित हो। और एक क्वालीफाइंग स्पीच होनी चाहिए जिसमें नेता न केवल अपनी वाक्कुशलता दर्शाए वरन् अपनी कार्य योजना रखें। यदि वह किये गये वादों को तय समय पर पूरा न करें तो उसे आगे से चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित किया जाए। नेता भाषण देते समय पूरे होशोहवास में रहे। मीडिया भी किसी के प्रति बायस होकर बात न करे। यदि हो सके तो चुनाव आयोग अपना एक चैनल बना कर खबरें निष्पादित करे। नियम जरूरी है और उसका पालन उससे ज्यादा जरूरी है।
कहा भी गया है ---
"महाजनो येन गतः सः पंथः।"
हाँ राजनीतिक दौर में एक दूसरे के प्रति घृणा का खुलकर गालियों में तब्दील हो जाना चिंता का विषय है। चुनाव मुद्दों पर लड़े जाय। आरोप प्रत्यारोप के झूठे प्रहारों के लिए कानून हो जो सख्ती से लागू हो तथा इसका त्वरित न्याय और सजा हो। लोगों को गुमराह करके सत्ता हथियाने वालों को सजा मिलनी चाहिए। जिस तरह से नेता एक दूसरे के प्रति अपशब्दों का प्रयोग कर रहे हैं वह दिन दूर नहीं जब लोग पटकी पटका पर उतर आए।यह विषय गंभीर और चिंतनीय है। हम सबको इस पर जरूर विचार करना चाहिए। किसी पार्टी और समाज में न बँधकर बल्कि सम्पूर्ण नेता जाति पर सोचना होगा। विचारवान नेता स्वयं आगे आएं और इस महत्वपूर्ण विषय पर एक नियम नीति बनाएँ। यदि सुधार न हुआ तो सामाजिक पर्यावरण बिगड़ जाएगा।
लोग समझदार हैं पर सत्ता लोलुपता कहाँ न पहुँचा दे। इसीलिए यह भी आवश्यक है कि रोज रोज चुनाव न हो। चुनाव लड़ने वालों की योग्यता निर्धारित हो। और एक क्वालीफाइंग स्पीच होनी चाहिए जिसमें नेता न केवल अपनी वाक्कुशलता दर्शाए वरन् अपनी कार्य योजना रखें। यदि वह किये गये वादों को तय समय पर पूरा न करें तो उसे आगे से चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित किया जाए। नेता भाषण देते समय पूरे होशोहवास में रहे। मीडिया भी किसी के प्रति बायस होकर बात न करे। यदि हो सके तो चुनाव आयोग अपना एक चैनल बना कर खबरें निष्पादित करे। नियम जरूरी है और उसका पालन उससे ज्यादा जरूरी है।
कहा भी गया है ---
"महाजनो येन गतः सः पंथः।"
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