चुनावों का दौर शुरू है। तमाम पार्टियां अपने को जनता का सबसे बढ़िया हितैषी साबित करने पर अड़ी हैं। इस कारण वे आपस में एक दूसरे के लिए कितने कटु वाक्युद्ध कर जाते हैं भगवान बचाए। जहाँ सत्तर साल बाद सत्ता में आकर जनता में नवीनता का विकास सुख देने के वादे। वहीं दूसरी ओर विगत में हुई लूटपाट और गलतियों के लिए माफी माँग कर पुनः सत्ता सुख प्राप्त करने का उन्माद या जुनून जोर पकड़े है। कौन कितना जन हितकारी है मीडिया की लीपापोती में जनता समझ ही नहीं पाती। हाँ इतना जरूर है कि आज दौर बदल गया है। अब लोग आँख बंद करके किसी पर विश्वास नहीं करते। इसीलिए तो इतना मेहनत करने वाली मीडिया का एक्सिट पोल भी नकारा साबित हो जाता है।
लेकिन तात्कालिक लाभ के लिए राजनेताओं का जनता में भेदभाव पैदा करना और वैमनस्यता का जहर बोते जाना शायद उचित नहीं है। परंतु इस लोकतंत्र की जमीन पर राजनीति की फसल बढ़े भी तो कैसे? कोई कहता है कि राजनीति का कितना पतन हो गया है तो हम सोच में पड़ जाते हैं। ऐसी कोई बात नहीं है क्योंकि यह भी सच है कि जो जीता वही सिकंदर। राजनीति करना कोई दूध भात खाना नहीं है। बड़ी कंटीली जमीन है यह। पर बेचारी निरीह जनता तो स्वाती नक्षत्र की बूँद रूपी उन्नति में साल दर साल जीवन को कुर्बान करती रहती है। 'आशा लागि रहत तन स्वासा।' या आशा ही जीवन है।
इतने दिन बाद भी और भाषण में इतने हितैषी नेता भी उसका कुछ भला नहीं कर पाए। शायद यह बिचारी निरीह जनता की नियति ही यही है कि वह सारी जिंदगी कमाए और टैक्स की मोटी गड्डी भुगतान करती रहे। और ये नेता उनको उन्नति का लालीपाप दिखाते रहे।
सब ठीक है परंतु जनता के बीच ऐसा जहर तो न बोए जिसका इलाज ही न हो सके। हम हिन्दुस्तानी सदियों से कष्ट भोगने के आदी हैं। अंग्रेजों के दिये मंत्र बांटो और राज करो से बहुत नुकसान हो चुका है।
चुनाव जीतने के लिए सबको शुभकामनाएँ परंतु मतदाता का खयाल रखें।
राकेश मालवीय
Friday, November 16, 2018
क्या होंगे चुनावों के परिणाम
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