Wednesday, July 10, 2019

जल संरक्षण

जल संकट पर मेरी राय
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जल संकट आजकल प्रमुख मुद्दा है। लोग कहते हैं की तीसरा विश्वयुद्ध पानी के लिए होगा। हालांकि इस समय वर्षा का पानी बहुत अधिक मात्रा में है। हम तमाम  तरह की मूर्तियां बनवा रहे हैं। करोड़ों, अरबों रुपये खर्च हो रहे हैं।यदि हम करोड़ों रुपए तालाब या बावड़िया बनवाने में लगा देते जल संग्रह प्रचुर मात्रा में हो जाता। हमारा जल संकट भी काफी कम हो जाता। हम पानी को नदियों और नालों के माध्यम से समुद्र में पुनः न डालें बल्कि उसकी संरक्षा करें। जिससे हमारे समुदाय के लोगों की प्यास भी बुझ सके। मेरे ख्याल से जल संग्रहण एक अच्छा उपाय होगा। हम जल संकट से बच भी सकते हैं और प्रकृति के द्वारा जल बचा भी सकते हैं। इस तरह जल संग्रह संभव हो सकता है। यदि मन में सत्य निष्ठा के साथ भावना जागृत हो। इसमें न केवल सरकार बल्कि प्राइवेट संस्थाएं भी अपना योगदान दे सकती हैं। अन्यथा बोतलों में बंद पानी भी सिमट जाएगा और तब तो निश्चित ही जल के लिए विश्व युद्ध हो सकता है। इसे कोई रोक भी ना पाएगा क्योंकि जल ही जीवन है। हमारे पुराने कवि रहीमदास ने कहा भी है---
रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरे मोती मानुष चून ।।
आओ हम सब मिलकर प्रकृति द्वारा प्रदत्त जल का संग्रहण करें और अपनी तथा अपने धरती की प्यास बुझाए। अन्यथा हम चाह कर भी सुरक्षित न रह पाएंगे क्यों कि जल ही जीवन है।
पंडित राकेश मालवीय

Saturday, May 25, 2019

शिक्षा सुधार

शिक्षा में बहुत सारी खामियां हैं। इन्हें हम कुछ परिवर्तन के साथ पूर्णतया सुधार सकते हैं। जैसे बच्चों में पढ़ने की प्रवृत्ति, बच्चों को पढ़ने के लिए कुछ पुरस्कार वगैरह भी जरूरी हो जाते हैं। विषय रोचक होने चाहिए। अध्यापक नीरस व निराश नहीं होना चाहिए। शुरू से ही रोचक विषयों को काव्यात्मक ढंग से  पढ़ाने से  बच्चे  आजीवन याद रखते हैं। अध्यापन कार्य कहानी, चित्र कथा,  वीडियो की व्याख्या करते हुए भी बताया जा सकता है। अध्यापन का मूल मंत्र बच्चों में एकाग्रता पैदा करना अनिवार्य होता है। यह अध्यापक विशेष की व्यक्तिगत प्रवृत्ति हो सकती है। बच्चे पूर्ण रूप से शिक्षित और सुसंस्कार बने इसके लिए प्रारंभिक कक्षाओं से संस्कृत का अनिवार्य होना आवश्यक है। बच्चों को नीतिपरक दोहे,  श्लोक तथा सुभाषितानि याद कराना चाहिए और आचरण में लाने के लिए वातावरण प्रदान करना चाहिए। यदि हम बच्चे से अपेक्षा करते हैं कि वह झूठ ना बोले तो हमें झूठ ना बोल कर एक मिसाल पैदा करनी चाहिए; क्योंकि यदि हम कहें कि सदा सत्य बोलो और स्वयं झूठ के सहारे चलें तो प्रभाव कारी नहीं हो सकती। अतः शिक्षक स्वयं आचरणवान तथा संस्कार से पूर्ण होना चाहिए। शिक्षा समितियों को अध्यापन के लिए अध्यापक चुनाव में इन बातों का गंभीरता से ध्यान रखना चाहिए। सामाजिक तौर पर हम अर्थ प्रवृति के कारण संस्कारों को भूलते जा रहे  हैं जो सामाजिक विघटन का महत्वपूर्ण कारण है। मेरे अनुसार भारत देश में संस्कृत भाषा तथा हमारे पूर्वज नामक पुस्तक को जरूर चलाना चाहिए। शिक्षा पद्धति संपूर्ण देश में एक समान होनी चाहिए। उसमें नैतिक शिक्षा पर प्रचुर मात्रा में बल देना चाहिए। यदि बच्चे में स्वयं सीखने की आदत डाल दी जाए तो हमारा प्रयास सफल और आसान हो जाएगा। इसके लिए सामाजिक जागरूकता की आवश्यकता है। साफ-सफाई, पर्यावरण,  रहन-सहन सब में आमूलचूल परिवर्तन जरूरी है। लोगों को अपने कर्म के प्रति सजगता और सावधानी व जागरूकता आवश्यक है। तभी हमारा मिशन शिक्षा में नई पद्धति के अनुसार देश को शिक्षित बनाना पूर्ण हो पाएगा।
धन्यवाद

Monday, February 18, 2019

पुलवामा संहार

चौदह फरवरी को जिस तरह से पाकिस्तान प्रशिक्षित आतंकवादियों ने जम्मू कश्मीर के पुलवामा में सीआरफीएफ के जवानों पर पीठ पीछे का कायराना हमला किया वह बहुत ज्यादा हृदय विदारक रहा। देश में उबाल है। चैनल और सोशल मीडिया में ज्यादा से ज्यादा विचारों का ज्वार आ गया। मानवता को शर्मसार करने वाला हमला हर भारतवासी को आंदोलित कर रहा है। सभी पाकिस्तान को नेस्तनाबूद कर देने की तमन्नाओं से भरे हैं। मीडिया लगातार शहीद और उनके परिवार के मनोभावों से अवगत करा रहा है। परिवार के आँसुओं में देश भक्त देशवासियों के आँसू मिल गये हैं। सभी का करेगा मुँह को आ रहा है। सभी की आशाएँ पाकिस्तान से बदला लेना है।
प्रधानमंत्री जी भी जनभावनाओं के साथ उद्वेलित व उद्विग्न हैं। वह भी वहीं चाहते हैं जो देशवासी चाहते हैं। परंतु पद और राष्ट्र प्रमुख होने की बाधाएँ और बड़ी जिम्मेदारियां भी हैं। चाहकर भी तुरंत वह न कर पाना जो चाहत है। पर मानवीय भावों पर वह हमसे अलग नहीं हैं। राष्ट्रीय रूप से जब कोई कदम उठाना होता है तो न तो परिणाम से पहले उसकी जानकारी साझा की जा सकती है और न ही बिना विचारे भिड़ा जा सकता है। अतः मीडिया जिम्मेदार भूमिका अदा करें और समझें कि इस समय क्या जरूरी है। आज आतंकवादी कार्रवाई में हालाँकि तीन आतंकवादी मारे गये परंतु साथ ही हमारा एक मेजर और तीन जवान फिर शहीद हो गये। दरअसल पाकिस्तान के छद्म और पाखंड़ी युद्ध में हमारे बीच के जयचंद बहुत बड़ा रोल निभा रहे हैं। ऐसे में शत्रु का मुकाबला बहुत दुष्कर व दुरूह हो जाता है।
यह तो तय है कि हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री पाकिस्तान की ईंट से ईंट बजाय बिना चैन से सोने वाले नहीं हैं फिर भी यह सब काल के गर्भ में छिपा है और इसे छिपा रहने दिया जाय तो अच्छा है। कहते हैं गरम गरम भात खाने से जीभ जल जाती है और स्वाद भी नहीं आता। इसलिए संजीदा देशप्रेमियों धैर्य और विवेक के साथ प्रधानमंत्री को काम करने का अवसर दो। तभी हमें निश्चित सफलता मिलेगी की और कायर से मर्दाना बदला भी पूरा होगा।
पंडित राकेश मालवीय

Saturday, December 22, 2018

विकास और विनाश

शहर से लेकर हाईवे की सड़कें मंत्रमुग्ध करने लगी है। कारें और गतिमान वाहन बड़ी शान से दौड़ने लगे हैं। बड़े लोग भी बड़ी शान से तेज गाड़ी का लुत्फ उठाते हैं। और इसे विकास का एक बड़ा पहलू मानते हैं। सचमुच तमाम दलीलें साबित भी करती है कि विकास दिख रहा है। विकास की सबकी अपनी परिभाषा है। सबकी सोच है, पर मेरा मन निगोड़ा आज भी इन सड़क निर्माण के नीचे कुर्बान हुए तमाम जीवनदायी वृक्षों के लिए जार जार रो रहा है। करीब पच्चीस किलोमीटर की मेरी दैनिक यात्रा की राह में तीन चार सौ पीपल, नीम, आम, महुआ, कैथा, जामुन और अमरूद जैसे वृक्षों के काटने का काम किया गया। कारण इन वृक्षों का अपराध चौड़ी होती सड़क के बगल में खड़ा होना। तमाम दया और कानून ने जिन पेड़ों का संरक्षण अभी तक किया। उन्हें उनकी उम्र और सेवाओं को देखे बिना विकास रूपी राक्षस ने बेरहमी से काटा। उनका खून बहता रहा पर किसी को दया नहीं आई। कानून ने भी विकास का खूब साथ निभाया।
आने वाली पीढ़ी इस विकास के साथ कैसे जियेगी? जब उसे सांस लेने के लिए ऑक्सीजन न मिलेगी। कथन याद आता है "एक वृक्ष दस पुत्र समान"। यह सरकारी नारा था। सभी वृक्षों की हत्या करके विकास बलबलाया है। सब कुछ बहुत सुंदर लग रहा है। परंतु कब तक? पानी तो पीने के लिए दुर्लभ हो रहा है हवा भी प्रदूषित। अब शायद पर्यावरण दिवस पर मसाला काफी हो जायगा। जे सी बसु साहब ने बताया था पेड़ पौधों में जीवन होता है। और जीवन हत्या के लिए आईपीसी की धारा में 302 का केस चलता है। पर शायद ऐसे बड़े कामों में शहादत की जरूरत होती ही है। यही तो है विकास बनाम विनाश।
पंडित राकेश मालवीय

Friday, November 16, 2018

क्या होंगे चुनावों के परिणाम

चुनावों का दौर शुरू है। तमाम पार्टियां अपने को जनता का सबसे बढ़िया हितैषी साबित करने पर अड़ी हैं। इस कारण वे आपस में एक दूसरे के लिए कितने कटु वाक्युद्ध कर जाते हैं भगवान बचाए। जहाँ सत्तर साल बाद सत्ता में आकर जनता में नवीनता का विकास सुख देने के वादे। वहीं दूसरी ओर विगत में हुई लूटपाट और गलतियों के लिए माफी माँग कर पुनः सत्ता सुख प्राप्त करने का उन्माद या जुनून जोर पकड़े है। कौन कितना जन हितकारी है मीडिया की लीपापोती में जनता समझ ही नहीं पाती। हाँ इतना जरूर है कि आज दौर बदल गया है। अब लोग आँख बंद करके किसी पर विश्वास नहीं करते। इसीलिए तो इतना मेहनत करने वाली मीडिया का एक्सिट पोल भी नकारा साबित हो जाता है।
लेकिन तात्कालिक लाभ के लिए राजनेताओं का जनता में भेदभाव पैदा करना और वैमनस्यता का जहर बोते जाना शायद उचित नहीं है। परंतु इस लोकतंत्र की जमीन पर राजनीति की फसल बढ़े भी तो कैसे? कोई कहता है कि राजनीति का कितना पतन हो गया है तो हम सोच में पड़ जाते हैं। ऐसी कोई बात नहीं है क्योंकि यह भी सच है कि जो जीता वही सिकंदर। राजनीति करना कोई दूध भात खाना नहीं है। बड़ी कंटीली जमीन है यह। पर बेचारी निरीह जनता तो स्वाती नक्षत्र की बूँद रूपी उन्नति में साल दर साल जीवन को कुर्बान करती रहती है। 'आशा लागि रहत तन स्वासा।' या आशा ही जीवन है।
इतने दिन बाद भी और भाषण में इतने हितैषी नेता भी उसका कुछ भला नहीं कर पाए। शायद यह बिचारी निरीह जनता की नियति ही यही है कि वह सारी जिंदगी कमाए और टैक्स की मोटी गड्डी भुगतान करती रहे। और ये नेता उनको उन्नति का लालीपाप दिखाते रहे।
सब ठीक है परंतु जनता के बीच ऐसा जहर तो न बोए जिसका इलाज ही न हो सके। हम हिन्दुस्तानी सदियों से कष्ट भोगने के आदी हैं। अंग्रेजों के दिये मंत्र बांटो और राज करो से बहुत नुकसान हो चुका है।
चुनाव जीतने के लिए सबको शुभकामनाएँ परंतु मतदाता का खयाल रखें।
राकेश मालवीय

Tuesday, November 13, 2018

पंड़ित जवाहरलाल नेहरू

काल और परिस्थिति कब क्या कर जाये कुछ कहा नहीं जा सकता। इसीलिए कहा जाता है कि आदमी नहीं समय बलवान होता है।
एक समय था जब पंड़ित जवाहरलाल नेहरू की तूती बोलती थी। देश के नवनिर्माता कहे जाते थे। कल उनकी जयंती है। बाल दिवस के रूप में हमेशा मनाई गई। परंतु आज का समय और है। देश के प्रधानमंत्री दूसरी पार्टी के हैं और वह कांग्रेस से तथा उनके लोगों से सरोकार नहीं रखना चाहते। इसीलिए जब भी इंदिरा गाँधी या जवाहरलाल नेहरू की जयंती होती है तो वह देश से पलायन कर जाते हैं। व्यक्ति नहीं, पार्टी नहीं वरन् उस पद के नाते उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करना देश के प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी है।
नेहरू जी करीब सोलह वर्ष से ऊपर देश के प्रधानमंत्री रहे हैं। मन से या बेमन से देश को दिशा दी है। आज उनके कार्यों को पूरी तरह नकार देना भलमनसाहत नहीं है। और यह परम्परा न तो देश हित की है और न ही व्यक्ति हित की। वरन यह एक आदर्श परम्परा के लिए कुठाराघात है। राष्ट्र धर्म के नवजागरण को जिन्दा करने वाले लोग ऐसा कैसे कर सकते हैं। प्रधानमंत्री ने तो उन्हें भी उच्च स्थान दिलाया जो उन दिनों उपेक्षित थे। फिर वह सहज स्वाभाविक वृत्ति क्यों भूल बैठे। जो वसुधैव कुटुम्बकम् को मानने वाले हैं वह अपने ही परिवार के साथ इतनी नफरत कैसे कर सकते हैं।
नेहरू जी ने परिस्थितियों पर राज किया है। यह सच है। आपने इसका आइना सबको दिखाया भी। नेहरू की उपेक्षा नहीं समालोचना होनी चाहिए। क्योंकि समय एक सा नहीं रहता। और समय की गति कोई नहीं समझ पाया। लोकतंत्र में सब समय एक सा हो भी नहीं सकता। समय और जनमत का कोई भरोसा नहीं। मैं नहीं चाहता समय की गर्द में किसी को पूरी तरह दबा दिया जाय।
वर्तमान प्रधानमंत्री दिल से देश का विकास कर रहे हैं। कल उनकी भी उपेक्षा हो। यह ठीक नहीं होगा। अतः कुछ मामलों पार्टी से ऊपर उठकर सोचना व करना चाहिए।
देश के सच्चे नागरिक होने के नाते देश के प्रथम प्रधानमंत्री को विनम्र श्रद्धाञ्जलि और बालदिवस की बधाई।

Sunday, November 11, 2018

बदलती सोच और इनके अंतर

एक बार गौतम बुद्ध एक आम की बगिया के नीचे से गुजर रहे थे। तभी उन्हें एक ईंट आकर उनके सिर में लगी। सिर में से खून निकलने लगा। तभी जिन बच्चों ने आम तोड़ने के लिए ईंट फेंकी थी आ गये। उन्होंने सात के सिर खून निकलते देखा तो डर गये। ये देख बुद्ध की आँख से आँसू निकलने लगा। बच्चों ने उन्हें रोते देखा तो माफी माँगते हुए कहा कि हमने जानबूझकर ईंट नहीं मारी हमें माफ कर दीजिए। संत ने कहा मुझे चोट लगी है इसलिए नहीं रो रहा। मुझे दुख है तुम्हारी ईंट लगने पर मैं कुछ दे नहीं पा रहा जबकि यह ईंट पेड़ में लगती तो वह निश्चित ही तुम्हे आम देते।
यह थे सात के विचार। परंतु आज हम लड़ जाते हैं। मानवीय गुणों का लोप होता जा रहा है। लोग इसे किताबों तक सीमित रखना चाहते हैं। जबसे हमारी कथनी और करनी में अंतर हुआ हम नितांत भ्रमित हैं। बहुतों को गलत करके तत्काल विजयी होते देखकर खुद की मर्यादा से डगमगाने लगते हैं और उसी गलत का अनुसरण करने को उद्यत होते हैं। हमें अपने मौलिक पहचान को नहीं गँवाना चाहिए।
कहा भी गया है ----
"कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली।"
अटपटा किन्तु सत्य...