शहर से लेकर हाईवे की सड़कें मंत्रमुग्ध करने लगी है। कारें और गतिमान वाहन बड़ी शान से दौड़ने लगे हैं। बड़े लोग भी बड़ी शान से तेज गाड़ी का लुत्फ उठाते हैं। और इसे विकास का एक बड़ा पहलू मानते हैं। सचमुच तमाम दलीलें साबित भी करती है कि विकास दिख रहा है। विकास की सबकी अपनी परिभाषा है। सबकी सोच है, पर मेरा मन निगोड़ा आज भी इन सड़क निर्माण के नीचे कुर्बान हुए तमाम जीवनदायी वृक्षों के लिए जार जार रो रहा है। करीब पच्चीस किलोमीटर की मेरी दैनिक यात्रा की राह में तीन चार सौ पीपल, नीम, आम, महुआ, कैथा, जामुन और अमरूद जैसे वृक्षों के काटने का काम किया गया। कारण इन वृक्षों का अपराध चौड़ी होती सड़क के बगल में खड़ा होना। तमाम दया और कानून ने जिन पेड़ों का संरक्षण अभी तक किया। उन्हें उनकी उम्र और सेवाओं को देखे बिना विकास रूपी राक्षस ने बेरहमी से काटा। उनका खून बहता रहा पर किसी को दया नहीं आई। कानून ने भी विकास का खूब साथ निभाया।
आने वाली पीढ़ी इस विकास के साथ कैसे जियेगी? जब उसे सांस लेने के लिए ऑक्सीजन न मिलेगी। कथन याद आता है "एक वृक्ष दस पुत्र समान"। यह सरकारी नारा था। सभी वृक्षों की हत्या करके विकास बलबलाया है। सब कुछ बहुत सुंदर लग रहा है। परंतु कब तक? पानी तो पीने के लिए दुर्लभ हो रहा है हवा भी प्रदूषित। अब शायद पर्यावरण दिवस पर मसाला काफी हो जायगा। जे सी बसु साहब ने बताया था पेड़ पौधों में जीवन होता है। और जीवन हत्या के लिए आईपीसी की धारा में 302 का केस चलता है। पर शायद ऐसे बड़े कामों में शहादत की जरूरत होती ही है। यही तो है विकास बनाम विनाश।
पंडित राकेश मालवीय
Saturday, December 22, 2018
विकास और विनाश
Friday, November 16, 2018
क्या होंगे चुनावों के परिणाम
चुनावों का दौर शुरू है। तमाम पार्टियां अपने को जनता का सबसे बढ़िया हितैषी साबित करने पर अड़ी हैं। इस कारण वे आपस में एक दूसरे के लिए कितने कटु वाक्युद्ध कर जाते हैं भगवान बचाए। जहाँ सत्तर साल बाद सत्ता में आकर जनता में नवीनता का विकास सुख देने के वादे। वहीं दूसरी ओर विगत में हुई लूटपाट और गलतियों के लिए माफी माँग कर पुनः सत्ता सुख प्राप्त करने का उन्माद या जुनून जोर पकड़े है। कौन कितना जन हितकारी है मीडिया की लीपापोती में जनता समझ ही नहीं पाती। हाँ इतना जरूर है कि आज दौर बदल गया है। अब लोग आँख बंद करके किसी पर विश्वास नहीं करते। इसीलिए तो इतना मेहनत करने वाली मीडिया का एक्सिट पोल भी नकारा साबित हो जाता है।
लेकिन तात्कालिक लाभ के लिए राजनेताओं का जनता में भेदभाव पैदा करना और वैमनस्यता का जहर बोते जाना शायद उचित नहीं है। परंतु इस लोकतंत्र की जमीन पर राजनीति की फसल बढ़े भी तो कैसे? कोई कहता है कि राजनीति का कितना पतन हो गया है तो हम सोच में पड़ जाते हैं। ऐसी कोई बात नहीं है क्योंकि यह भी सच है कि जो जीता वही सिकंदर। राजनीति करना कोई दूध भात खाना नहीं है। बड़ी कंटीली जमीन है यह। पर बेचारी निरीह जनता तो स्वाती नक्षत्र की बूँद रूपी उन्नति में साल दर साल जीवन को कुर्बान करती रहती है। 'आशा लागि रहत तन स्वासा।' या आशा ही जीवन है।
इतने दिन बाद भी और भाषण में इतने हितैषी नेता भी उसका कुछ भला नहीं कर पाए। शायद यह बिचारी निरीह जनता की नियति ही यही है कि वह सारी जिंदगी कमाए और टैक्स की मोटी गड्डी भुगतान करती रहे। और ये नेता उनको उन्नति का लालीपाप दिखाते रहे।
सब ठीक है परंतु जनता के बीच ऐसा जहर तो न बोए जिसका इलाज ही न हो सके। हम हिन्दुस्तानी सदियों से कष्ट भोगने के आदी हैं। अंग्रेजों के दिये मंत्र बांटो और राज करो से बहुत नुकसान हो चुका है।
चुनाव जीतने के लिए सबको शुभकामनाएँ परंतु मतदाता का खयाल रखें।
राकेश मालवीय
Tuesday, November 13, 2018
पंड़ित जवाहरलाल नेहरू
काल और परिस्थिति कब क्या कर जाये कुछ कहा नहीं जा सकता। इसीलिए कहा जाता है कि आदमी नहीं समय बलवान होता है।
एक समय था जब पंड़ित जवाहरलाल नेहरू की तूती बोलती थी। देश के नवनिर्माता कहे जाते थे। कल उनकी जयंती है। बाल दिवस के रूप में हमेशा मनाई गई। परंतु आज का समय और है। देश के प्रधानमंत्री दूसरी पार्टी के हैं और वह कांग्रेस से तथा उनके लोगों से सरोकार नहीं रखना चाहते। इसीलिए जब भी इंदिरा गाँधी या जवाहरलाल नेहरू की जयंती होती है तो वह देश से पलायन कर जाते हैं। व्यक्ति नहीं, पार्टी नहीं वरन् उस पद के नाते उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करना देश के प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी है।
नेहरू जी करीब सोलह वर्ष से ऊपर देश के प्रधानमंत्री रहे हैं। मन से या बेमन से देश को दिशा दी है। आज उनके कार्यों को पूरी तरह नकार देना भलमनसाहत नहीं है। और यह परम्परा न तो देश हित की है और न ही व्यक्ति हित की। वरन यह एक आदर्श परम्परा के लिए कुठाराघात है। राष्ट्र धर्म के नवजागरण को जिन्दा करने वाले लोग ऐसा कैसे कर सकते हैं। प्रधानमंत्री ने तो उन्हें भी उच्च स्थान दिलाया जो उन दिनों उपेक्षित थे। फिर वह सहज स्वाभाविक वृत्ति क्यों भूल बैठे। जो वसुधैव कुटुम्बकम् को मानने वाले हैं वह अपने ही परिवार के साथ इतनी नफरत कैसे कर सकते हैं।
नेहरू जी ने परिस्थितियों पर राज किया है। यह सच है। आपने इसका आइना सबको दिखाया भी। नेहरू की उपेक्षा नहीं समालोचना होनी चाहिए। क्योंकि समय एक सा नहीं रहता। और समय की गति कोई नहीं समझ पाया। लोकतंत्र में सब समय एक सा हो भी नहीं सकता। समय और जनमत का कोई भरोसा नहीं। मैं नहीं चाहता समय की गर्द में किसी को पूरी तरह दबा दिया जाय।
वर्तमान प्रधानमंत्री दिल से देश का विकास कर रहे हैं। कल उनकी भी उपेक्षा हो। यह ठीक नहीं होगा। अतः कुछ मामलों पार्टी से ऊपर उठकर सोचना व करना चाहिए।
देश के सच्चे नागरिक होने के नाते देश के प्रथम प्रधानमंत्री को विनम्र श्रद्धाञ्जलि और बालदिवस की बधाई।
Sunday, November 11, 2018
बदलती सोच और इनके अंतर
एक बार गौतम बुद्ध एक आम की बगिया के नीचे से गुजर रहे थे। तभी उन्हें एक ईंट आकर उनके सिर में लगी। सिर में से खून निकलने लगा। तभी जिन बच्चों ने आम तोड़ने के लिए ईंट फेंकी थी आ गये। उन्होंने सात के सिर खून निकलते देखा तो डर गये। ये देख बुद्ध की आँख से आँसू निकलने लगा। बच्चों ने उन्हें रोते देखा तो माफी माँगते हुए कहा कि हमने जानबूझकर ईंट नहीं मारी हमें माफ कर दीजिए। संत ने कहा मुझे चोट लगी है इसलिए नहीं रो रहा। मुझे दुख है तुम्हारी ईंट लगने पर मैं कुछ दे नहीं पा रहा जबकि यह ईंट पेड़ में लगती तो वह निश्चित ही तुम्हे आम देते।
यह थे सात के विचार। परंतु आज हम लड़ जाते हैं। मानवीय गुणों का लोप होता जा रहा है। लोग इसे किताबों तक सीमित रखना चाहते हैं। जबसे हमारी कथनी और करनी में अंतर हुआ हम नितांत भ्रमित हैं। बहुतों को गलत करके तत्काल विजयी होते देखकर खुद की मर्यादा से डगमगाने लगते हैं और उसी गलत का अनुसरण करने को उद्यत होते हैं। हमें अपने मौलिक पहचान को नहीं गँवाना चाहिए।
कहा भी गया है ----
"कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली।"
अटपटा किन्तु सत्य...
Saturday, November 10, 2018
राजनीतिक भाषा
हाँ राजनीतिक दौर में एक दूसरे के प्रति घृणा का खुलकर गालियों में तब्दील हो जाना चिंता का विषय है। चुनाव मुद्दों पर लड़े जाय। आरोप प्रत्यारोप के झूठे प्रहारों के लिए कानून हो जो सख्ती से लागू हो तथा इसका त्वरित न्याय और सजा हो। लोगों को गुमराह करके सत्ता हथियाने वालों को सजा मिलनी चाहिए। जिस तरह से नेता एक दूसरे के प्रति अपशब्दों का प्रयोग कर रहे हैं वह दिन दूर नहीं जब लोग पटकी पटका पर उतर आए।यह विषय गंभीर और चिंतनीय है। हम सबको इस पर जरूर विचार करना चाहिए। किसी पार्टी और समाज में न बँधकर बल्कि सम्पूर्ण नेता जाति पर सोचना होगा। विचारवान नेता स्वयं आगे आएं और इस महत्वपूर्ण विषय पर एक नियम नीति बनाएँ। यदि सुधार न हुआ तो सामाजिक पर्यावरण बिगड़ जाएगा।
लोग समझदार हैं पर सत्ता लोलुपता कहाँ न पहुँचा दे। इसीलिए यह भी आवश्यक है कि रोज रोज चुनाव न हो। चुनाव लड़ने वालों की योग्यता निर्धारित हो। और एक क्वालीफाइंग स्पीच होनी चाहिए जिसमें नेता न केवल अपनी वाक्कुशलता दर्शाए वरन् अपनी कार्य योजना रखें। यदि वह किये गये वादों को तय समय पर पूरा न करें तो उसे आगे से चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित किया जाए। नेता भाषण देते समय पूरे होशोहवास में रहे। मीडिया भी किसी के प्रति बायस होकर बात न करे। यदि हो सके तो चुनाव आयोग अपना एक चैनल बना कर खबरें निष्पादित करे। नियम जरूरी है और उसका पालन उससे ज्यादा जरूरी है।
कहा भी गया है ---
"महाजनो येन गतः सः पंथः।"